॥ श्री गायत्री आरती ॥
ॐ जय गायत्री माता, मैया जय गायत्री माता।
सबके पापन को हरो, जो जन शरण तुम्हारी आता॥
ॐ जय गायत्री माता…
भावार्थ: हे गायत्री माता, आपकी जय हो! जो भी व्यक्ति आपकी शरण में आता है, आप उसके सभी पापों को हर लेती हैं।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, तुमको ध्यान लगावें।
तरणी कुंडल शोभित, हे माता सुख पावें॥
ॐ जय गायत्री माता…
भावार्थ: ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव तीनों मिलकर आपका ध्यान करते हैं। सूर्य के समान चमकते कुंडलों से सुशोभित हे माता, आपके ध्यान से सभी सुख प्राप्त करते हैं।
मस्तक सिंदूर सोहे, मैया मस्तक सिंदूर सोहे।
कुमकुम के छींटे न्यारे, माथे पर चंदन शोभे॥
ॐ जय गायत्री माता…
भावार्थ: हे माता, आपके मस्तक पर सिंदूर शोभित है, कुमकुम के अनूठे छींटे सुशोभित हैं और माथे पर चंदन का तिलक शोभायमान है।
ऋषि मुनि सब ध्यावें, चारों वेद बखानें।
तीनों लोक तुम्हें पूजें, चारों धाम तुम जानें॥
ॐ जय गायत्री माता…
भावार्थ: सभी ऋषि-मुनि आपका ध्यान करते हैं और चारों वेद आपकी महिमा का बखान करते हैं। तीनों लोक आपकी पूजा करते हैं और आप चारों धामों की ज्ञाता हैं।
मातु पिता तुम मेरे, शरणा और न काई।
तुमसे ही सब कुछ पाया, और न दाता भाई॥
ॐ जय गायत्री माता…
भावार्थ: हे माता, आप ही मेरे माता-पिता हैं, आपके अतिरिक्त कोई और शरण नहीं है। आपसे ही सब कुछ प्राप्त हुआ है, आपके अतिरिक्त कोई और दाता नहीं है।


