॥ श्री नृसिंह आरती ॥
ॐ जय नृसिंह देवा, ॐ जय नृसिंह देवा।
स्तम्भ से प्रकट भये, प्रह्लाद की सेवा॥
ॐ जय नृसिंह देवा…
भावार्थ: हे नृसिंह देव, आपकी जय हो! आप भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए खम्भे (स्तम्भ) से प्रकट हुए।
हिरण्यकशिपु जिन मारा, नखन से विदारा।
भक्त प्रह्लाद उबारा, दुष्ट संहारा॥
ॐ जय नृसिंह देवा…
भावार्थ: जिन्होंने हिरण्यकशिपु का वध किया, अपने नखों से उसे विदीर्ण किया। भक्त प्रह्लाद की रक्षा की और दुष्ट का संहार किया।
उग्र रूप अति भारी, नर सिंह शरीरी।
दैत्य दलन अवतारी, भक्त सुखकारी॥
ॐ जय नृसिंह देवा…
भावार्थ: अत्यंत उग्र और विशाल रूप धारण किया, मनुष्य का शरीर और सिंह का मुख। दैत्यों का दलन करने वाले अवतारी, भक्तों को सुख देने वाले।
लक्ष्मी नृसिंह विराजें, भक्तन सुख साजें।
दुष्ट दलन को गाजें, जगत में गाजें॥
ॐ जय नृसिंह देवा…
भावार्थ: लक्ष्मी नृसिंह विराजमान हैं, भक्तों के सुख की रचना करते हैं। दुष्टों के दलन के लिए गर्जना करते हैं, सारे जगत में उनकी गर्जना गूँजती है।
ब्रह्मादिक सुर सेवें, ऋषि मुनि ध्यावें।
वेद पुराण यश गावें, सब सुख पावें॥
ॐ जय नृसिंह देवा…
भावार्थ: ब्रह्मा आदि देवता सेवा करते हैं, ऋषि-मुनि ध्यान करते हैं। वेद और पुराण यश गाते हैं, सब सुख प्राप्त करते हैं।
जो कोई आरती गावे, नृसिंह जी की।
दुख दारिद्र मिट जावे, कृपा हो प्रभु की॥
ॐ जय नृसिंह देवा…
भावार्थ: जो कोई नृसिंह जी की यह आरती गाता है, उसके दुख और दरिद्रता मिट जाती है और प्रभु की कृपा प्राप्त होती है।


