॥ श्री नवग्रह आरती ॥
जय जय आरती नवग्रह देवा।
कर जोड़ कर विनती, करूँ तुम्हारी सेवा॥
भावार्थ: नवग्रह देवताओं की जय हो। हाथ जोड़कर विनती करते हुए मैं आपकी सेवा करता हूँ।
सूरज देव प्रथम ग्रह स्वामी।
तेज प्रताप अपार तुम्हारा, अंधकार के नामी॥
चन्द्र देव तुम शीतल कारी।
मन के स्वामी सोम तुम्हारी, ज्योति जगत उजियारी॥
भावार्थ: सूर्य देव प्रथम ग्रह के स्वामी हैं, आपका तेज और प्रताप अपार है, आप अंधकार का नाश करते हैं। चन्द्र देव आप शीतलता प्रदान करते हैं, मन के स्वामी सोम हैं, आपकी ज्योति जगत को प्रकाशित करती है।
मंगल देव अंगारक कहलाये।
भूमि पुत्र तुम लाल विराजे, संकट सब मिट जाये॥
बुध ग्रह तुम बुद्धि विधाता।
सौम्य स्वरूप हरित वर्ण शोभित, विद्या के दाता॥
भावार्थ: मंगल देव अंगारक कहलाते हैं, भूमि पुत्र लाल रंग में विराजमान हैं, आपसे सभी संकट मिट जाते हैं। बुध ग्रह बुद्धि के विधाता हैं, सौम्य स्वरूप हरे वर्ण में शोभित हैं, विद्या प्रदान करने वाले हैं।
गुरु बृहस्पति देव दयाला।
देवगुरु तुम ज्ञान के सागर, पीत वस्त्र विशाला॥
शुक्र ग्रह तुम दैत्य गुरु स्वामी।
श्वेत वर्ण अति शोभा धारी, भोग विलास के नामी॥
भावार्थ: गुरु बृहस्पति देव दयालु हैं, देवगुरु ज्ञान के सागर हैं, पीत वस्त्र धारण किए हैं। शुक्र ग्रह दैत्य गुरु के स्वामी हैं, श्वेत वर्ण में अत्यंत शोभा धारण करते हैं, भोग विलास के प्रदाता हैं।
शनि देव सूर्य के पुत्र।
कृष्ण वर्ण छाया के नंदन, न्याय करें पवित्र॥
राहु केतु छाया ग्रह दोनों।
ग्रहण रचें सूरज चन्दा को, मायावी जग जानो॥
भावार्थ: शनि देव सूर्य के पुत्र हैं, कृष्ण वर्ण छाया के नंदन हैं, पवित्र न्याय करते हैं। राहु और केतु दोनों छाया ग्रह हैं, सूर्य और चन्द्र का ग्रहण रचते हैं, जगत इन्हें मायावी जानता है।
नवग्रह देवता की आरती जो कोई गावे।
ग्रह दोष सब कट जावें, मनवांछित फल पावे॥
भावार्थ: जो कोई नवग्रह देवताओं की यह आरती गाता है, उसके सभी ग्रह दोष कट जाते हैं और मनवांछित फल की प्राप्ति होती है।
॥ इति श्री नवग्रह आरती सम्पूर्ण ॥


