॥ आरती ॥
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन की, सुख सम्पत्ति दाता॥
भावार्थ: हे संतोषी माता, आपकी जय हो! आप अपने सेवकों को सुख और सम्पत्ति प्रदान करने वाली हैं।
सुन्दर चीर सुनहरा, मां तन पर सोहे।
मन्द मन्द मुसकाती, छवि जन मन मोहे।
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन की, सुख सम्पत्ति दाता॥
भावार्थ: हे माँ, आपके शरीर पर सुन्दर सुनहरा वस्त्र शोभायमान है। आप मन्द-मन्द मुस्कुराती हैं और आपकी छवि जन-मन को मोहित करती है।
कमल विमल बहु शोभित, दोनों हाथन सोहे।
मोतियन की माला गले, शोभा अति मोहे।
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन की, सुख सम्पत्ति दाता॥
भावार्थ: आपके दोनों हाथों में निर्मल कमल शोभायमान हैं। गले में मोतियों की माला विराजमान है, जिसकी शोभा अत्यन्त मनमोहक है।
स्वर्ण सिंहासन बैठीं, मुकुट विराजे माथा।
हीरा पन्ना दमके, कुंदन झिलमिलाता।
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन की, सुख सम्पत्ति दाता॥
भावार्थ: आप स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हैं और आपके मस्तक पर मुकुट शोभित है। उसमें हीरे-पन्ने दमक रहे हैं और कुंदन झिलमिला रहा है।
गुड़ चना का भोग मां, तुमको भोग लगाएं।
संतोषी मां तुम बिन, कौन खबर पाएं।
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन की, सुख सम्पत्ति दाता॥
भावार्थ: हे माँ, हम आपको गुड़ और चने का भोग लगाते हैं। हे संतोषी माँ, आपके बिना हमारी कौन सुध लेगा?
कठिन दुख जब ऊपर आवे, दूर करो मां सारे।
पुत्र पति सौभाग्यदाई, दुखियन के दुख हारे।
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन की, सुख सम्पत्ति दाता॥
भावार्थ: हे माँ, जब कठिन दुख आएँ तो उन्हें दूर कीजिए। आप पुत्र, पति और सौभाग्य देने वाली हैं तथा दुखियों के दुख हरने वाली हैं।


