॥ आरती ॥
जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।
सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी॥
भावार्थ: हे श्री शनिदेव, आपकी जय हो! आप भक्तों का हित करने वाले हैं। आप सूर्य देव के पुत्र हैं और छाया देवी आपकी माता हैं।
श्याम अंग वक्र दृष्टि, चतुर्भुजा धारी।
नीलाम्बरधर नित्य चले, रवि के भारी।
जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।
सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी॥
भावार्थ: आपका श्याम वर्ण का शरीर है, दृष्टि वक्र है और आप चार भुजाओं को धारण करते हैं। नीले वस्त्र पहनकर आप नित्य विचरण करते हैं और सूर्य से भी अधिक प्रभावशाली हैं।
क्रूर दृष्टि अति टेढ़ी, भक्तन पर सीधी।
करत सदा नर नारी की, आस उम्मीदी।
जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।
सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी॥
भावार्थ: आपकी दृष्टि अत्यन्त क्रूर और टेढ़ी है, परन्तु भक्तों पर सीधी (कृपालु) रहती है। आप सदैव नर-नारियों की आशाओं और उम्मीदों को पूरा करते हैं।
पैरन में लोह जंजीर, बजत है भारी।
कर में गदा विराजे, कान्ति अति प्यारी।
जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।
सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी॥
भावार्थ: आपके पैरों में लोहे की भारी जंजीर बजती रहती है। आपके हाथ में गदा विराजमान है और आपकी कान्ति अत्यन्त मनोहर है।
नीलम रत्न मनोहर, प्रभु के मन भाये।
तिल तेल अर्पण करें, संकट मिट जाये।
जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।
सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी॥
भावार्थ: नीलम रत्न प्रभु शनिदेव को अत्यन्त प्रिय है। जो व्यक्ति तिल और तेल अर्पण करता है, उसके सभी संकट दूर हो जाते हैं।
शनिवार व्रत जो करे, शरण तेरी आये।
ताको सदा सुख सम्पत्ति, मनवांछित पाये।
जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।
सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी॥
भावार्थ: जो मनुष्य शनिवार का व्रत करता है और आपकी शरण में आता है, वह सदा सुख-सम्पत्ति और मनोवांछित फल प्राप्त करता है।


