॥ श्री ॥
॥ दोहा ॥ जय जय जय जग पावनी, जय सुरसरि सुख दैन। भव भय हरणी नीर शुचि, हरहु तिमिर मद मैन॥
॥ चौपाई ॥
जय जय गंगे सुरसरि माता। शिव मस्तक पर तू सुखदाता॥
भगीरथ तप कीन्ह अपारा। स्वर्ग से तू भूतल पर धारा॥
जो नर तेरे जल में न्हावे। भव बन्धन से मुक्ति पावे॥
॥ इति श्री शुभम् ॥


