॥ श्री ॥
॥ दोहा ॥ जनक जननि पद्महिं पद, शिर धरि बारम्बार। शारद शतमुख वन्दना, करहु बुद्धि विस्तार॥
॥ चौपाई ॥
जय श्री सकल बुद्धि बलरासी। जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी॥
जय जय जय वीणाकर धारी। करती सदा सुहंस सवारी॥
श्वेत वस्त्र सोहत तन सुंदर। कंठ सोह मुक्तामणि सुंदर॥
विद्या दान देहु महतारी। मेटहु सकल अज्ञान हमारी॥
॥ इति श्री शुभम् ॥


