॥ अथ श्री दुर्गा कवचम् ॥
मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत ब्रह्मा जी द्वारा महर्षि मार्कण्डेय को उपदेशित परम गोपनीय एवं अचूक अंग-रक्षा स्तोत्र।
नवदुर्गा के पावन नाम
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥
भावार्थ: प्रथम दुर्गा ‘शैलपुत्री’, द्वितीय ‘ब्रह्मचारिणी’, तृतीय ‘चंद्रघंटा’, चतुर्थ ‘कूष्मांडा’, पंचम ‘स्कंदमाता’, षष्ठ ‘कात्यायनी’, सप्तम ‘कालरात्रि’, अष्टम ‘महागौरी’ और नवम ‘सिद्धिदात्री’ हैं। ये नौ नाम साक्षात महात्मा ब्रह्मा जी द्वारा कहे गए हैं।
प्रमुख अंग-रक्षा मंत्र
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्नदेवता।
दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी॥
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी।
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी॥
भावार्थ: पूर्व दिशा में ऐन्द्री शक्ति मेरी रक्षा करें, अग्निकोण में अग्निदेवता, दक्षिण में वाराही और नैर्ऋत्य कोण में खड्गधारिणी रक्षा करें। पश्चिम में वारुणी, वायव्य में मृगवाहिनी, उत्तर में कौमारी और ईशान कोण में शूलधारिणी रक्षा करें।
शिखायां मे रमा रक्षेच्छिरो रक्षतु सर्वदा।
ललाटे पातु चामुण्डा भालं रक्षतु भामिनी॥
फलश्रुति एवं महत्व
जो मनुष्य नित्य तीनों संध्याओं में श्रद्धापूर्वक दुर्गा कवच का पाठ करता है, उसे संसार में कोई पराजित नहीं कर सकता। भूत-प्रेत, पिशाच, डाकनी-शाकिनी, विष, अग्नि और अकाल मृत्यु का भय सदा के लिए समाप्त हो जाता है।


