॥ श्री महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् ॥
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य विरचित परम ओजस्वी एवं लयबद्ध देवी स्तुति।
प्रमुख श्लोक एवं भावार्थ
श्लोक १:
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ १॥
भावार्थ: हे हिमालय की कन्या (गिरिनंदिनी)! संसार को आनंदित करने वाली, समस्त विश्व को अपनी लीलाओं से प्रमुदित करने वाली तथा नंदी आदि गणों द्वारा पूजित देवी! विंध्याचल पर्वत के शिखर पर निवास करने वाली, भगवान विष्णु को आह्लादित करने वाली और इंद्र द्वारा वंदित हे भगवती! हे नीलकंठ भगवान शिव की अर्धांगिनी, समस्त सृष्टि को अपना परिवार मानने वाली और जीवों पर असीम कृपा बरसाने वाली! हे सुंदर जटाजूट वाली महिषासुरमर्दिनी शैलपुत्री! आपकी सदा ही जय हो, जय हो!
श्लोक २:
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते।
दनुजनिरोषिणी दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणी सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ २॥
भावार्थ: देवताओं को वरदान देने वाली, दुर्धर्ष शत्रुओं का दमन करने वाली, दुर्मुख जैसे दैत्यों को दंड देने वाली और नित्य आनंद में मग्न रहने वाली देवी! तीनों लोकों का पोषण करने वाली, भगवान शिव को संतुष्ट करने वाली, पापों का हरण करने वाली और मधुर नाद में रमने वाली! दानवों के गर्व को नष्ट करने वाली हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!
पाठ का आध्यात्मिक फल
इस स्तोत्र के पाठ से शरीर और मन में अद्भुत शौर्य, आत्मविश्वास और ऊर्जा का संचार होता है। घर की नकारात्मक शक्तियाँ, नजर दोष और शत्रुओं के षड्यंत्र निष्प्रभावी हो जाते हैं।


