॥ श्री चामुंडा आरती ॥
जय चामुंडे माता, मैया जय चामुंडे माता।
चंड-मुंड संहारिणि, सुर-नर सुखदाता॥
भावार्थ: हे माता चामुंडा! आपकी जय हो। चंड और मुंड का संहार करने वाली, देवताओं और मनुष्यों को सुख देने वाली माँ की जय हो।
काली रूप धरे माता, तांडव नृत्य करे।
भक्तन के दुख हरती, अभयदान दे॥
जय चामुंडे माता…
भावार्थ: माँ ने काली का रूप धारण किया और तांडव नृत्य किया। भक्तों के दुख हरती हैं और अभयदान देती हैं।
मुंडमाल गल सोहे, रक्तपात भारी।
रण में शत्रु संहारे, देती है बलिहारी॥
जय चामुंडे माता…
भावार्थ: गले में मुंडमाल सुशोभित है। रण में शत्रुओं का संहार करने वाली माँ के ऊपर भक्त बलिहारी जाते हैं।
खड्ग त्रिशूल धारिणी, डमरू बजाती।
भक्तन की रक्षा हेतु, सदा चली आती॥
जय चामुंडे माता…
भावार्थ: खड्ग और त्रिशूल धारण किए, डमरू बजाने वाली माँ भक्तों की रक्षा के लिए सदा आती हैं।
हिमगिरि पर तेरा धाम, योगिनि संगाती।
तुमको जो ध्यावे सच्चे, सब इच्छा पूर्ण जाती॥
जय चामुंडे माता…
भावार्थ: हिमालय पर माँ का धाम है, योगिनियाँ साथ रहती हैं। जो सच्चे मन से आपका ध्यान करते हैं उनकी सब इच्छाएँ पूर्ण होती हैं।
श्री चामुंडा जी की आरती, जो कोई नर गावे।
भय निर्भय होकर जीवे, अंत मोक्ष पावे॥
जय चामुंडे माता…
भावार्थ: जो मनुष्य श्री चामुंडा जी की यह आरती गाता है, वह निर्भय होकर जीता है और अंत में मोक्ष प्राप्त करता है।


