॥ आरती ॥
ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।
जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥
भावार्थ: हे गंगे माता, आपकी जय हो! जो मनुष्य आपका ध्यान करता है, वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है।
चन्द्र सी ज्योत तुम्हारी, जल निर्मल आता।
शरण पड़े जो तेरी, सो नर तर जाता।
ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।
जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥
भावार्थ: आपकी ज्योति चन्द्रमा के समान है और आपका जल अति निर्मल है। जो व्यक्ति आपकी शरण में आता है, वह भवसागर से तर जाता है।
पुत्र सगर के तारे, सब जग को ज्ञाता।
कृपा दृष्टि हो तुम्हारी, त्रिभुवन सुख दाता।
ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।
जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥
भावार्थ: आपने राजा सगर के पुत्रों का उद्धार किया, यह सारा संसार जानता है। आपकी कृपा दृष्टि तीनों लोकों को सुख प्रदान करती है।
एक बार जो प्राणी, शरण तेरी आता।
यम की त्रास मिटाकर, परमपद पाता।
ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।
जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥
भावार्थ: जो प्राणी एक बार भी आपकी शरण में आ जाता है, उसके यमराज का भय समाप्त हो जाता है और वह परम पद (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
आरती मातु तुम्हारी, जो नर नित गाता।
दास वही सहज में, मुक्ति को पाता।
ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।
जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥
भावार्थ: जो मनुष्य प्रतिदिन आपकी आरती गाता है, वह सेवक सहज ही मुक्ति प्राप्त कर लेता है।


