॥ श्री काली आरती ॥
जय काली जय काली, जय महाकाली माता।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, तोरी महिमा गाता॥
जय काली जय काली…
भावार्थ: हे काली माता, हे महाकाली माता, आपकी जय हो! ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव तीनों आपकी महिमा का गुणगान करते हैं।
शिव के मस्तक पर ज्योति, मुकुट विराजे प्यारा।
कानों में कुंडल शोभे, अद्भुत रूप तुम्हारा॥
जय काली जय काली…
भावार्थ: भगवान शिव के मस्तक पर विराजित ज्योति आपके मुकुट में सुशोभित है। आपके कानों में कुंडल शोभित हैं और आपका रूप अद्भुत है।
रक्तबीज दैत्यन मारी, शुंभ निशुंभ संहारी।
महिषासुर वध किया, चामुंडा रूपधारी॥
जय काली जय काली…
भावार्थ: आपने रक्तबीज नामक दैत्य को मारा और शुंभ-निशुंभ का संहार किया। चामुंडा रूप धारण करके आपने महिषासुर का वध किया।
मुंडमाल गले सोहे, खड्ग खप्पर धारी।
भैरव संग विराजें, शव पर नृत्य करारी॥
जय काली जय काली…
भावार्थ: आपके गले में मुंडमाला शोभित है, हाथों में खड्ग और खप्पर धारण किए हैं। आप भैरव के संग विराजती हैं और शव पर प्रचंड नृत्य करती हैं।
जो जन तुमको ध्यावे, सो सब सुख पावे।
विपदा से रक्षा करो, दुश्मन भय भगावे॥
जय काली जय काली…
भावार्थ: जो व्यक्ति आपका ध्यान करता है, वह सभी सुख प्राप्त करता है। हे माता, विपदाओं से रक्षा कीजिए और शत्रुओं के भय को दूर कीजिए।
श्री काली जी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥
जय काली जय काली…
भावार्थ: शिवानंद स्वामी कहते हैं कि जो मनुष्य श्री काली जी की यह आरती गाता है, वह मनवांछित फल प्राप्त करता है।


