॥ श्री कार्तिकेय आरती ॥
ॐ जय कार्तिकेय देवा, ॐ जय कार्तिकेय देवा।
शिव शक्ति के नंदन, षण्मुख रूप सेवा॥
ॐ जय कार्तिकेय देवा…
भावार्थ: हे कार्तिकेय देव, आपकी जय हो! आप भगवान शिव और शक्ति (पार्वती) के पुत्र हैं। छह मुखों वाले आपके दिव्य स्वरूप की सेवा करते हैं।
षण्मुख द्वादश भुजा, मयूर पर सवारी।
शक्ति आयुध कर शोभित, तारकासुर मारी॥
ॐ जय कार्तिकेय देवा…
भावार्थ: आपके छह मुख और बारह भुजाएँ हैं, मोर आपका वाहन है। हाथों में शक्ति (भाला) शोभित है, जिससे आपने तारकासुर का वध किया।
कृत्तिका ने पाला जिनको, कार्तिक नाम पाया।
देवसेनापति बने जब, सुरन दुख हराया॥
ॐ जय कार्तिकेय देवा…
भावार्थ: कृत्तिका नक्षत्र की छह माताओं ने जिनका पालन किया, इसलिए कार्तिकेय नाम पड़ा। जब आप देवताओं के सेनापति बने तो देवताओं का दुख दूर किया।
गंगा ने धारण किया, अग्निदेव ने संवारा।
शरवण वन में प्रकटे, जग तारनहारा॥
ॐ जय कार्तिकेय देवा…
भावार्थ: गंगा माता ने आपको धारण किया और अग्निदेव ने आपकी रक्षा की। शरवण (सरकंडे) के वन में आप प्रकट हुए, संसार का उद्धार करने वाले।
कुमार स्वामी सुब्रह्मण्य, गुहा नाम तेरा।
जो कोई तुमको ध्यावे, मिटे दुख अँधेरा॥
ॐ जय कार्तिकेय देवा…
भावार्थ: कुमार, स्वामी, सुब्रह्मण्य और गुहा — ये सब आपके नाम हैं। जो कोई आपका ध्यान करता है, उसके सभी दुख और अज्ञान का अंधकार मिट जाता है।


