॥ श्री ललिता आरती ॥
जय ललिता माता, मैया जय ललिता माता।
त्रिपुरसुंदरी जगदंबा, सुरनर हित दाता॥
भावार्थ: हे माता ललिता! आपकी जय हो। त्रिपुरसुंदरी, जगदंबा देवताओं और मनुष्यों का हित करने वाली माँ की जय हो।
सिंहासन पर बैठी माता, रत्न-भूषणधारी।
श्री चक्र में विराजमान, नाम ललितारी॥
जय ललिता माता…
भावार्थ: रत्न-भूषण धारण किए माता सिंहासन पर विराजती हैं। श्री चक्र में विराजमान माँ ललिता नाम से विख्यात हैं।
अनंत कोटि ब्रह्मांडनायिका, परम शक्ति धारी।
ब्रह्मा विष्णु शिव के ऊपर, तुम हो महेशवरी॥
जय ललिता माता…
भावार्थ: असंख्य ब्रह्मांडों की नायिका, परम शक्ति की धारक माता ब्रह्मा, विष्णु और शिव से भी परे महेश्वरी हैं।
पाश अंकुश धनुष-बाण, हाथन में राजे।
लाल वस्त्र-भूषण शोभित, ललित छटा साजे॥
जय ललिता माता…
भावार्थ: हाथों में पाश, अंकुश, धनुष और बाण शोभित हैं। लाल वस्त्र और आभूषणों में माँ की ललित छटा मनोहर है।
भक्त जन की रक्षा हेतु, सदा तुम आती।
सच्चे मन से जो भजे, सब संकट हर जाती॥
जय ललिता माता…
भावार्थ: भक्तजनों की रक्षा के लिए माँ सदा आती हैं। जो सच्चे मन से भजते हैं उनके सब संकट हर लेती हैं।
श्री ललिता जी की आरती, जो कोई जन गावे।
श्री विद्या की कृपा पाकर, मोक्ष फल को पावे॥
जय ललिता माता…
भावार्थ: जो माँ ललिता की यह आरती गाता है वह श्री विद्या की कृपा पाकर मोक्ष फल प्राप्त करता है।


