॥ श्री राम आरती ॥
आरती श्री रामचंद्र जी की,
कीर्ति निधान सीतापति जी की।
भावार्थ: यश के भंडार, माता सीता के पति भगवान श्री रामचंद्र जी की आरती करते हैं।
दशरथ नंदन राम सुखदाई,
सकल जगत के हो तुम राई।
सुंदर श्याम, रूप मनोहर,
तन को देखत मन हर्षाई।
आरती श्री रामचंद्र जी की…
भावार्थ: दशरथ नंदन सुखदाई श्री राम, समस्त जगत के स्वामी हैं। आपका श्याम और मनोहर रूप देखकर मन आनंदित हो उठता है।
जानकी रमण श्री रघुनंदन,
भक्त जनों के तुम हो वंदन।
लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न संग में,
मिल करते सब हैं अभिनंदन।
आरती श्री रामचंद्र जी की…
भावार्थ: जानकी के रमण, रघुकुल नंदन, भक्तजनों के वंदनीय भगवान राम को लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न सब मिलकर अभिनंदन करते हैं।
नवमी के दिन प्रकट भए प्रभु,
चौदह वर्ष वनवास किया।
रावण मार सिया को लाए,
भक्तों को अपना कर लिया।
आरती श्री रामचंद्र जी की…
भावार्थ: चैत्र नवमी को प्रकट हुए प्रभु ने चौदह वर्ष का वनवास किया। रावण का वध करके माता सीता को वापस लाए और भक्तों को अपना बना लिया।
भक्त कहें जय जय रघुराई,
रघुकुल नायक हो बलिहारी।
जो जन ध्यावे तन मन लाई,
रामचंद्र तिनके बलिहारी।
आरती श्री रामचंद्र जी की…
भावार्थ: भक्तजन जयकार करते हैं। जो रघुकुल नायक श्री राम का तन-मन लगाकर ध्यान करते हैं, उन पर रामचंद्र जी बलिहारी जाते हैं।
श्री रामचंद्र जी की आरती, जो कोई जन गावे।
तन मन धन सब अर्पण करके, राम कृपा को पावे।
आरती श्री रामचंद्र जी की…
भावार्थ: जो कोई तन, मन और धन अर्पण करके श्री रामचंद्र जी की यह आरती गाता है, वह राम जी की कृपा प्राप्त करता है।


