॥ श्री दुर्गाष्टकम् ॥
माँ दुर्गा के आठ पावन छंदों में रचित परम मधुर एवं संकट-मोचक स्तोत्र।
श्लोक १
शरण्ये वरदे देवि शरणागतवत्सले।
दुर्गार्तिहारिणि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥ १॥
भावार्थ: हे शरण देने वाली, वरदायिनी, शरणागतों पर वात्सल्य बरसाने वाली और दुर्गम दुःखों का हरण करने वाली माँ दुर्गे! आपको मेरा बारंबार नमस्कार है।
श्लोक २
महिषघ्नि महामाये चामुण्डे मुण्डमर्दिनि।
आयुर्बलं यशो देहि देवि नमोऽस्तु ते॥ २॥
भावार्थ: महिषासुर का संहार करने वाली, महामाया, चण्ड और मुण्ड का दलन करने वाली हे चामुंडे! आप मुझे दीर्घायु, बल और निर्मल यश प्रदान करें।
श्लोक ३
ब्रह्मविष्णुशिवाद्यैश्च वन्दिते कमलालये।
भक्त्या समर्चिते दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥ ३॥
भावार्थ: ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवताओं द्वारा सदा वंदित और कमल पर विराजमान हे दुर्गे! आपको मेरा सादर प्रणाम है।
फलश्रुति
दुर्गाष्टक का नित्य पाठ करने से भय, कलह, दरिद्रता और गृह-क्लेश का निवारण होकर जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।


