॥ श्री ॥
॥ पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ॥
भक्त शिरोमणि मीराबाई विरचित अमर पद
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।
वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरू, किरपा करि अपनायो॥ पायो जी मैंने…
पद
जनम जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो।
खरचै नहिं कोई चोर न लेवै, दिन दिन बढ़त सवायो॥
पायो जी मैंने…
सत की नांव खेवटिया सतगुरू, भवसागर तर आयो।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरखि हरखि जस गायो॥
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो॥
भावार्थ एवं आध्यात्मिक संदेश
मीराबाई कहती हैं कि सद्गुरु की कृपा से मुझे प्रभु के नाम रूपी अमूल्य रत्न मिल गया है। यह ऐसा दिव्य धन है जिसे न कोई चुरा सकता है और न खर्च करने से घटता है, बल्कि नित्य स्मरण से यह सवाया होकर बढ़ता ही जाता है। सत्य की नाव और सद्गुरु रूपी खेवनहार के सहारे मैंने इस संसार सागर को सहज ही पार कर लिया है।
॥ इति श्री शुभम् ॥


