॥ वैष्णव जन तो तेने कहिये ॥
संत कवि नरसिंह मेहता विरचित अमर पद
वैष्णव जन तो तेने कहिये जे, पीर पराई जाणे रे।
पर-दुःखे उपकार करे तोये, मन अभिमान न आणे रे॥ वैष्णव जन तो…
पद १
सकळ लोकमां सहुने वंदे, निंदा न करे केनी रे।
वाच काछ मन निश्चल राखे, धन-धन जननी तेनी रे॥ वैष्णव जन तो…
पद २
सम-दृष्टि ने तृष्णा त्यागी, पर-स्त्री जेने मात रे।
जिह्वा थकी असत्य न बोले, पर-धन नव झाले हाथ रे॥ वैष्णव जन तो…
पद ३
मोह-माया व्यापे नहि जेने, दृढ़ वैराग्य जेना मनमां रे।
राम-नाम-शूं ताली लागी, सकळ तीरथ तेना तनमां रे॥ वैष्णव जन तो…
पद ४
वण-लोभी ने कपट-रहित छे, काम-क्रोध निवार्या रे।
भणे नरसैंयो तेनुं दर्शन करतां, कुल एकोतेर तार्या रे॥ वैष्णव जन तो…
सम्पूर्ण भावार्थ
सच्चा वैष्णव (ईश्वर का भक्त) वह है जो दूसरों के दुःख और पीड़ा को अपनी पीड़ा समझकर अनुभव करता है। जो दूसरों के दुःखों का निवारण करके भी अपने मन में तनिक भी अहंकार नहीं लाता। जो संपूर्ण जगत में सभी का सम्मान करता है, कभी किसी की निंदा नहीं करता और जिसके वचन, आचरण व मन पवित्र रहते हैं। संत नरसिंह मेहता कहते हैं कि ऐसे निष्काम भक्त के दर्शन मात्र से मनुष्य की बहत्तर पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है।


