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Ayodhya Ram Mandir — Chalisa Ghar
बजरंग बाण - भगवान हनुमान

बजरंग बाण

Dedicated to भगवान हनुमानहिन्दी (Hindi)

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॥ श्री ॥

॥ दोहा ॥

निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥

भावार्थ: जो भक्त पूर्ण विश्वास, निश्चल प्रेम और सम्मानपूर्वक श्री हनुमान जी से प्रार्थना करता है, संकटमोचन श्री हनुमान जी उसके सभी शुभ कार्यों को निश्चित रूप से सिद्ध करते हैं।


॥ चौपाई ॥

जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥
भावार्थ: हे भक्तों और संतों का कल्याण करने वाले श्री हनुमान जी, आपकी जय हो! हे प्रभु, हमारी विनम्र प्रार्थना सुन लीजिए। अपने सेवक के कार्यों में तनिक भी विलंब न करें, शीघ्र दौड़कर आइए और हमें परम सुख प्रदान कीजिए।

जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुर लोका॥
भावार्थ: जैसे आपने एक ही छलांग में विशाल समुद्र पार कर लिया था और सुरसा के विशाल मुख में प्रवेश कर अपनी बुद्धि से बाहर आ गए थे; और लंका के द्वार पर जब लंकिनी ने आपको रोका, तो आपने एक ही प्रहार से उसे परास्त कर सुरलोक का मार्ग दिखा दिया था।

जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥
बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥
भावार्थ: आपने लंका पहुंचकर भक्त विभीषण को प्रभु श्री राम का संदेश देकर सुखी किया और माता सीता के दर्शन कर परम सौभाग्य प्राप्त किया। आपने अशोक वाटिका को तहस-नहस कर दिया और राक्षसों के अस्त्र-शस्त्रों को नष्ट कर दिया।

अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥
लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥
भावार्थ: आपने रावण के बलशाली पुत्र अक्षय कुमार का संहार किया और अपनी पूंछ में अग्नि लपेटकर स्वर्णमयी लंका को भस्म कर दिया। लंका लाख की भांति जल उठी और संपूर्ण देवलोक में आपकी जय-जयकार होने लगी।

अब बिलंब केंहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अंतरयामी॥
जय जय लखन प्रान के दाता। आतुर ह्वै दुख हरहु निपाता॥
भावार्थ: हे अंतर्यामी प्रभु! अब किस कारण से विलंब कर रहे हैं? मुझ पर कृपा कीजिए। हे लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा करने वाले दयानिधान, शीघ्र आकर मेरे समस्त कष्टों का नाश कीजिए।

जै गिरिधर जै जै सुखदाई। तिलक सहित प्रभु लखन कन्हाई॥
जय कपीस जय सुग्रीव मीता। जय जय जय सीतापति मीता॥
भावार्थ: द्रोणागिरि पर्वत को उठाने वाले और सुख देने वाले हे हनुमान जी, आपकी जय हो! प्रभु श्री राम और लक्ष्मण जी के प्यारे, सुग्रीव के सखा और सीतापति श्री राम के परम आत्मीय भक्त की जय हो!

जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुख पावत जन केहि अपराधा॥
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥
भावार्थ: हे अगाध महिमा वाले हनुमान जी, आपकी जय हो! आपका यह दास किस अपराध के कारण कष्ट भोग रहा है? मैं किसी कठिन पूजा, जप, तप अथवा नियम-आचार को नहीं जानता; मैं तो केवल आपका अनन्य सेवक हूँ।

बन उपबन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं॥
जनकसुता हरि दास कहावौ। ताकी सपथ बिलंब न लावौ॥
भावार्थ: वन, उपवन, मार्ग, पर्वत अथवा घर में, आपके असीम बल के सहारे हम किसी भी भय से नहीं डरते। आपको माता जानकी और प्रभु श्री राम की सौगंध है, अब हमारी सहायता करने में तनिक भी विलंब न कीजिए।

उठु उठु चलु तोहि राम दुहाई। पाँयन परौं कर जोरि मनाई॥
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥
ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल॥
भावार्थ: हे प्रभु! आपको श्री राम की दुहाई है, उठिए और दौड़कर आइए; मैं हाथ जोड़कर आपके पावन चरणों में वंदना करता हूँ। हे चपल वेग से चलने वाले मारुतिनंदन, आपकी हुंकार से दुष्टों और संकटों का समूह थर्राकर भाग खड़ा होता है।

अपनै जन को तुरत उबारौ। सुमिरत होय आनंद अपारौ॥
यह बजरंग बाण जेहि मारै। ताहि कहो फिर कौन उबारै॥
भावार्थ: अपने भक्त को तुरंत संकट से उबार लीजिए; आपके स्मरण मात्र से हृदय में अपार आनंद की अनुभूति होती है। जिस पर यह अमोघ बजरंग बाण चल जाता है, भला संसार में उसे कौन बचा सकता है!

पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करैं प्रान की॥
यह बजरंग बाण जो जापै। ताते भूत-प्रेत सब काँपै॥
भावार्थ: जो भी श्रद्धापूर्वक बजरंग बाण का पाठ करता है, हनुमान जी स्वयं उसके प्राणों और सम्मान की रक्षा करते हैं। जो इस बजरंग बाण का नित्य जप करता है, उसके भय से समस्त भूत, प्रेत और नकारात्मक शक्तियां थर-थर कांपने लगती हैं।


॥ दोहा ॥

उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै धरि ध्यान।
बाधा सब बैकुंठ को, गमन करै हनुमान॥

भावार्थ: जो हृदय में दृढ़ विश्वास और निष्ठा रखकर, हनुमान जी की शरण में आकर ध्यानपूर्वक इस बाण स्तोत्र का पाठ करता है, हनुमान जी उसकी समस्त बाधाओं को दूर कर देते हैं।

॥ इति श्री शुभम् ॥