॥ पावन रंगोत्सव होली एवं होलिका दहन ॥
फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला सनातन संस्कृति का परम उल्लासमय महापर्व।
होलिका दहन की पावन कथा
दैत्यराज हिरण्यकश्यप अपने पुत्र प्रह्लाद को भगवान श्री हरि विष्णु की भक्ति से विमुख करना चाहता था। जब प्रह्लाद अपने निश्चय से नहीं डिगे, तो हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका (जिसे अग्नि से न जलने का वरदान था) को प्रह्लाद को गोद में लेकर चिता पर बैठने का आदेश दिया।
परंतु भगवान के भक्त प्रह्लाद निरंतर नारायण नाम का स्मरण करते रहे। ईश्वर की कृपा से होलिका जलकर भस्म हो गई और प्रह्लाद का बाल भी बांका नहीं हुआ। इस प्रकार यह पर्व सिखाता है कि अहंकार और बुराई चाहे जितनी प्रबल हो, ईश्वर के निष्कपट भक्त की रक्षा साक्षात परमात्मा करते हैं।
धुलेंडी एवं रंगोत्सव
होलिका दहन के अगले दिन ‘धुलेंडी’ पर रंगों का उत्सव मनाया जाता है। ब्रज, मथुरा और वृंदावन में राधा-कृष्ण के अलौकिक दिव्य प्रेम की स्मृति में फूलों और अबीर-गुलाल की होली खेली जाती है। यह पर्व समस्त राग-द्वेष और मनमुटाव भुलाकर एक-दूसरे को गले लगाने का संदेश देता है।


