॥ श्री ॥
॥ परम पावन महापर्व महाशिवरात्रि ॥
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की महानिशा, जब आदिदेव महादेव और जगज्जननी माता पार्वती का पावन विवाह हुआ था और प्रथम ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ था।
महाशिवरात्रि का तात्विक महत्व
‘शिव’ का अर्थ है परम चेतना और ‘रात्रि’ का अर्थ है विश्राम व लय। महाशिवरात्रि की रात मनुष्य के मन को सांसारिक विकारों से मुक्त कर शिव तत्व में लीन करने की सबसे फलदायी रात्रि है। इस दिन रात्रि जागरण और जप से वर्ष भर की शिव पूजा का पुण्य एक साथ प्राप्त हो जाता है।
चार प्रहर पूजन का विधान
| प्रहर | समय | अभिषेक द्रव्य | मंत्र |
|---|---|---|---|
| प्रथम प्रहर | सायं ६:०० से ९:०० | गाय का कच्चा दूध | ॐ ह्रीं ईशानाय नमः |
| द्वितीय प्रहर | रात्रि ९:०० से १२:०० | दही | ॐ ह्रीं अघोराय नमः |
| तृतीय प्रहर | मध्यरात्रि १२:०० से ३:०० | शुद्ध गाय का घी | ॐ ह्रीं वामदेवाय नमः |
| चतुर्थ प्रहर | भोर ३:०० से ६:०० | शुद्ध शहद एवं गंगाजल | ॐ ह्रीं सद्योजाताय नमः |
व्रत एवं फलश्रुति
दिन भर निराहार रहकर शिवलिंग पर अखंड बिल्वपत्र, धतूरा, भांग और गंगाजल अर्पित करने से समस्त पाप धुल जाते हैं और अंत में शिवधाम की प्राप्ति होती है।
॥ इति श्री शुभम् ॥


