॥ श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम् ॥
ब्रह्माण्ड पुराण के उत्तरखण्ड में भगवान हयग्रीव द्वारा महर्षि अगस्त्य को उपदेशित माँ पराशक्ति ललिता महात्रिपुरसुन्दरी के १००० दिव्य नाम।
ध्यान श्लोक एवं भावार्थ
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्-
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
भावार्थ: प्रातःकालीन सिंदूर के समान लाल कांति वाली, त्रिनेत्रा, मस्तक पर माणिक्य जटित मुकुट और बालचंद्र धारण करने वाली, मंद मुस्कान वाली, हाथों में रत्नमय पात्र और लाल कमल धारण करने वाली परम सौम्य जगदम्बा माँ ललिता का हम ध्यान करते हैं।
स्तोत्र का दिव्य स्वरूप एवं श्रीचक्र
श्री ललिता सहस्रनाम में माँ भगवती के स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों रूपों का सांगोपांग वर्णन है। यह स्तोत्र कुण्डलिनी जागरण और श्रीविद्या उपासना का सर्वोच्च शिखर माना गया है।
फलश्रुति
नित्य पाठ से असाध्य रोगों, भूत-बाधा, ग्रह दोष और दारिद्र्य का समूल नाश होता है। साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सहज प्राप्ति होती है।


