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श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र (सम्पूर्ण पाठ) — भगवान विष्णु

श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र (सम्पूर्ण पाठ)

Dedicated to भगवान विष्णुहिन्दी (Hindi)

॥ श्री ॥

॥ श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रम् ॥

महाभारत के अनुशासन पर्व (अध्याय १४९) में शरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह द्वारा दिया गया परम कल्याणकारी उपदेश।


मंगलाचरण एवं ध्यान

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

भावार्थ: शांत स्वरूप, शेषनाग की शय्या पर शयन करने वाले, जिनकी नाभि से कमल उत्पन्न हुआ है, देवों के देव, संसार के आधार, आकाश के सदृश सर्वव्यापी, मेघों के समान श्यामवर्ण, सुंदर अंगों वाले, माँ लक्ष्मी के कांत (स्वामी), कमल के समान नयनों वाले, योगियों द्वारा ध्यान में जानने योग्य, भवसागर के भय का नाश करने वाले और संपूर्ण लोकों के एकमात्र स्वामी भगवान विष्णु को मैं सादर वंदन करता हूँ।


१००० नामों का माहात्म्य

आदि शंकराचार्य ने कहा है कि भगवान विष्णु के इन सहस्र नामों का संकीर्तन समस्त वेदों के अध्ययन से भी बढ़कर फल देने वाला है।


फलश्रुति

य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत्।
नाशुभं प्राप्नुयात् किञ्चित् सोऽमुत्रेह च मानवः॥
जो मनुष्य इसका नित्य पाठ या श्रवण करता है, उसे इस लोक और परलोक में कभी कोई अशुभ प्राप्त नहीं होता।

॥ इति श्री शुभम् ॥