॥ अपराजिता स्तुति (या देवी सर्वभूतेषु) ॥
श्री दुर्गा सप्तशती (अध्याय ५)
प्रमुख श्लोक एवं भावार्थ
या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
भावार्थ: जो देवी समस्त प्राणियों में भगवान विष्णु की माया रूप में स्थित हैं, उनको मेरा बारंबार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
भावार्थ: जो देवी समस्त जीवों में चेतना (जीवन शक्ति) के रूप में विराजमान हैं, उनको मेरा बारंबार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
भावार्थ: जो देवी सब प्राणियों में बुद्धि रूप में स्थित हैं, उनको मेरा बारंबार नमन है।
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
भावार्थ: जो देवी सब जीवों में स्नेहमयी माता के रूप में स्थित हैं, उन जगज्जननी को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम है।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
भावार्थ: जो देवी समस्त चराचर में प्राण और शक्ति रूप में स्थित हैं, उन भगवती को मेरा बारंबार नमस्कार है।


