॥ ऋग्वेदीय श्री सूक्तम् ॥
ऋग्वेद परिशिष्ट में वर्णित माँ महालक्ष्मी का साक्षात प्राकट्य सूक्त, जो दरिद्रता का समूल नाश करने वाला है।
प्रमुख मंत्र एवं भावार्थ
मंत्र १:
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
भावार्थ: हे सर्वज्ञ अग्निदेव! आप मेरे लिए उन सुवर्ण के समान कांति वाली, हरिणी के सदृश चंचल व मनोहर, सोने और चांदी के आभूषणों से सुशोभित, चंद्रमा के समान शीतल व आह्लादकारी, स्वर्णमयी माँ लक्ष्मी का मेरे घर में आह्वान कीजिए।
मंत्र ५:
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे॥
भावार्थ: जो चंद्रमा के समान शीतल कांति वाली, अपने परम यश से दैदीप्यमान, देवताओं द्वारा पूजित और अत्यंत उदार हैं—उन कमल पर विराजमान माँ लक्ष्मी की मैं शरण लेता हूँ। हे माँ! मेरे घर से दरिद्रता (अलक्ष्मी) का नाश हो, मैं केवल आपका वरण करता हूँ।
फलश्रुति
दीपावली, धनतेरस और शुक्रवार को श्रीसूक्त के १६ मंत्रों से गाय के घी या कमलगट्टे से आहुति देने से अष्टलक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।


