॥ श्री विष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् ॥
महाभारत के अनुशासन पर्व में शरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह द्वारा युधिष्ठिर को दिया गया परम उपदेश।
प्रारंभिक मंगल श्लोक एवं भावार्थ
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
भावार्थ: श्वेत वस्त्र धारण करने वाले, चंद्रमा के समान निर्मल कांति वाले, चार भुजाओं से सुशोभित और परम प्रसन्न मुख वाले सर्वव्यापी भगवान विष्णु का हम समस्त विघ्नों की शांति के लिए ध्यान करते हैं।
युधिष्ठिर का प्रश्न एवं भीष्म जी का उत्तर
किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम्।
स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम्॥
भावार्थ: युधिष्ठिर ने पूछा: इस संसार में एकमात्र परम देवता कौन है? एकमात्र परम आश्रय कौन है? किसकी स्तुति और किसकी पूजा करने से मनुष्य परम कल्याण को प्राप्त होता है?
जगतः प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम्।
स्तुवन्नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः॥
भावार्थ: भीष्म जी ने कहा: संपूर्ण जगत के स्वामी, देवों के देव, अनंत पुरुषोत्तम भगवान श्रीमन नारायण के एक सहस्र (१०००) नामों का नित्य भक्तिभाव से गुणगान करने से मनुष्य सब दुःखों से मुक्त हो जाता है।
फलश्रुति
आदि शंकराचार्य ने इस स्तोत्र पर भव्य भाष्य लिखा है। इसके नित्य श्रवण व पाठ से आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, विद्या और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।


