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श्री गायत्री महामंत्र — माँ गायत्री / सूर्य देव

श्री गायत्री महामंत्र

Dedicated to माँ गायत्री / सूर्य देवहिन्दी (Hindi)

॥ श्री ॥

॥ श्री गायत्री महामंत्र ॥

ॐ भूर्भुवः स्वः
तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात्॥


प्रत्येक पद का सरल शब्दार्थ

पद अर्थ
परब्रह्म परमात्मा का मूल नाम, प्रणव नाद
भूः भूलोक, प्राण स्वरूप, अस्तित्व
भुवः भुवर्लोक, दुःखों का नाश करने वाला, चेतना
स्वः स्वर्लोक, सुख स्वरूप, आनंदमय
तत् उस सर्वव्यापी परमपिता को
सवितुः सविता देवता (समस्त ब्रह्मांड के उत्पादक व प्रकाशक)
वरेण्यं सर्वश्रेष्ठ, वरण करने योग्य, पूजनीय
भर्गः अज्ञान और पापों को भस्म करने वाला पावन दिव्य तेज
देवस्य परम देव भगवान का
धीमहि हम ध्यान करते हैं, अंतःकरण में धारण करते हैं
धियः हमारी बुद्धि, प्रज्ञा और विवेक को
यः जो परमात्मा
नः हमारी
प्रचोदयात् सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें, जागृत करें

सम्पूर्ण भावार्थ

उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा का हम ध्यान करते हैं। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे।


महामंत्र की महिमा एवं पौराणिक महत्व

गायत्री मंत्र वेदों का सर्वश्रेष्ठ सारभूत मंत्र है। इसे वेदमाता कहा गया है। ऋग्वेद (मण्डल ३, सूक्त ६२, मन्त्र १०) में महर्षि विश्वामित्र द्वारा यह मंत्र अनुभूत हुआ था। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है—“गायत्री छन्दसामहम्” अर्थात मैं समस्त छंदों में गायत्री छंद हूँ।

गायत्री मंत्र की उपासना से आत्मा का मल, विक्षेप और आवरण दूर होता है। यह ज्ञान, तेज और सात्विक ऊर्जा का अक्षय स्रोत है।


जप की विधि एवं नियम

  1. समय: प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व (ब्रह्ममुहूर्त) या संधिकाल में पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  2. आसन: कुश या ऊनी आसन पर शांत चित्त से पद्मासन या सुखासन में बैठें।
  3. माला: रुद्राक्ष या तुलसी की माला से १०८ बार जप करना अति फलदायी माना जाता है।
  4. मानसिक स्थिति: मन को शांत रखें और आज्ञा चक्र (दोनों भौंहों के मध्य) में उगते हुए स्वर्णिम सूर्य का ध्यान करें।

गायत्री मंत्र जप के दिव्य लाभ

  • मानसिक शांति व एकाग्रता: नियमित जप से मानसिक तनाव, भय और अवसाद समाप्त होते हैं तथा एकाग्रता में अभूतपूर्व वृद्धि होती है।
  • बुद्धि व विवेक का विकास: विद्यार्थियों और साधकों के लिए यह मंत्र स्मरण शक्ति और प्रज्ञा बढ़ाने वाला है।
  • सकारात्मक ऊर्जा का संचार: शरीर के चक्र जागृत होते हैं और प्रभामंडल (Aura) में दिव्य प्रकाश का विस्तार होता है।
  • पापों का नाश: जन्म-जन्मांतर के संचित पापों का क्षय होकर आत्म-साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त होता है।
॥ इति श्री शुभम् ॥